
टूटियाबेड़ क्षेत्र राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है, जो प्राचीन काल से आस्था, वीरता और बलिदान की परंपरा का प्रतीक रहा है। यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, ऐतिहासिक घटनाक्रमों का भी साक्षी रहा है। चौहान वंश ने 12 वी शाब्दी में गुजरात राठौर के परिवार के युवराज को गोद लिया ईडर राठौड पूनह में अपने अस्तित्व में आया
लोक कथा के अनुसार 15 वीं-18 वीं शताब्दी वर्षा पूर्व जाबर कोट में एक ग्वाला अपनी गायों को चरा रहा था।
उस धार ने उस ग्वाले की हत्या कर रहे थे और टूटियाबेड़ जागीर की और मवेशियों को लूटते हुए आगे बढ़ रहे थे
उज्जैन की शिप्रा नदी के पास से कृष्णपाल सिंह जी आना लेने जाबर कोट आये थे और टूटियाबेड़ जागीर समदि के वह रुके हुए थे
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए टूटियाबेड़ जागीर की राजकुमारी ने अपने राजपूत सरदारों, समधी जनों तथा स्थानीय भील योद्धाओं के साथ एक सेना गठित की और इस धार के आने का संकेत ढोल बजाकर सब को दिया समदि और स्थानीय भील भाग गए उनकी फौज देख कर राजकुमारी ने श्राप दिया की जो योद्धा छोड़ के जाह रहे हो वापस यहाँ आह कर कोई नहीं रह पायेगा
टूटियाबेड़ जागीर की राजकुमारी को भीषण योद्धा कर रही थी उनका पैर तोड़ दिया तभी उन्होंने कही सिफाइओ को मार दिया उन्हें वृक्ष के साथ बांध कर जिन्दा जला दिया
लाखा घाटी में पहला भीषण संघर्ष हुआ, जहाँ ढोल बजाने वाले को मार दिया गया। इसी युद्ध में सूर्य सिंह शहीद हो गए। पहाड़ी की चढ़ाई के दौरान ठाकुर जी के प्रिय साथी कानुड़ा भील भी वीरगति को प्राप्त हुए।
महाराजा दिपसिंह अपनी सेना के साथ लड़ते हुए पहाड़ी के ऊपरी भाग तक पहुँच गए। दूसरी ओर, से जाबर कोट में के वीर युवराज कृष्णसिंह के साथ दूसरी दिशा से आगे बढ़े और लूटी गई गायों को वापस छुड़ाने का प्रयास किया। दोनों ओर से घेराबंदी कर उस धार को पीछे धकेला ।
युद्ध अत्यंत भीषण हो गया, जिसमें कई राजपूत और भील योद्धा शहीद हुए। इसी दौरान, कुछ शत्रुओं ने पीछे से आक्रमण कर कृष्णसिंह सरदार को घेर लिया। वीरतापूर्वक लड़ते हुए उनका सिर कट गया,सिर कटने के बाद भी उनका धड़ युद्ध करता रहा और अनेक शत्रुओं का संहार किया।
अंततः उनका धड़ घोड़े सहित दूर जाकर महादेव गौतमेश्वर के चरणों में गिरा। उस स्थान पर चमेली का पौधा उत्पन्न हुआ और उस क्षेत्र का नाम “कटलिया” पड़ा, जो आज “कड़लिया” के नाम से प्रसिद्ध है।
इसी युद्ध में ठाकुर जी के भाई के तीन टुकड़े कर दिए गए शहीद हुए। उनकी स्मृति में उस पहाड़ी पर “कटलीया बावजी” के नाम से उन के बलिदान की यद् में स्थापना की गई
1857 ईस्वी में भारत में स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला भड़क उठी। इस कठिन समय में अनेक सरदारों ने बांसवाड़ा के महारावल का साथ छोड़ दिया। 1858 ईस्वी के दिसंबर माह में विद्रोही दल के नेता तात्या टोपे के नेतृत्व में क्रांतिकारी दल कुशलगढ़ की दिशा से बांसवाड़ा की ओर अग्रसर हुआ।

रास्ते में कुशलगढ़ के राव ने उन्हें रोकने का भरसक प्रयास किया, किंतु विद्रोहियों की अधिक संख्या के कारण वे सफल नहीं हो सके। उनकी इस सेवा के लिए अंग्रेज सरकार द्वारा बाद में उन्हें सम्मानित किया गया।
11 दिसंबर को विद्रोहियों ने बांसवाड़ा पहुँचकर उस पर अधिकार कर लिया। इस संकटपूर्ण समय में महारावल को अपने राज्य के उत्तर दिशा के जंगलों में शरण लेनी पड़ी।
इसी दौरान तात्या टोपे कुछ समय के लिए इस क्षेत्र में ठहरे।

उक्त कालखंड में टूटियाबेड़ जागीर का विशेष महत्व रहा। महाराज श्री मानसिंह राठौड़, जो इस जागीर के प्रमुख शासक थे, क्षेत्र के पुनर्निर्माण एवं संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। उनके साथियों द्वारा साबरकांठा (उत्तरी गुजरात) विजयनगर राज्य की दिशा से ऊँटों पर लाया जा रहा अनाज एवं धन, जो टूटियाबेड़ जागीर के नव निर्माण हेतु लाया जा रहा था, लूट लिया गया। इस घटना में महाराज मानसिंह राठौड़ के समधी की हत्या कर दी गई तथा स्वयं महाराज गंभीर रूप से घायल हुए, जिससे उनका एक पैर निष्क्रिय हो गया।
महाराजा श्री मानसिंह राठौड़ एवं उनके परिवारजनों ने अदम्य साहस एवं वीरता का परिचय दिया। जिस पहाड़ी पर वे वीरगति को प्राप्त हुए, वहाँ उनकी स्मृति में “करटिया बावजी” के नाम से एक छत्री (स्मारक) का निर्माण किया गया।
उनके साथ उनके परिवार, समधी एवं अन्य साथियों ने भी बलिदान दिया। इस पवित्र स्थल पर करटिया बावजी की स्थापना की गई, जो आज भी श्रद्धा एवं आस्था का प्रमुख केंद्र है।

बाद में उन्हें गोद लेकर 1915 ईस्वी में टूटियाबेड़ जागीर का स्वामी श्री मानसिंह राठौड़ को बनाया गया। उनके नेतृत्व में क्षेत्र का धार्मिक एवं सामाजिक विकास निरंतर आगे बढ़ा।
करटिया भेरुजी: 500 वर्षों की अटूट आस्था का प्रतीक
करटिया बावसी केवल आज की श्रद्धा का केंद्र नहीं हैं, बल्कि उनका इतिहास 500 वर्षों से भी अधिक पुराना है। इतिहास के पन्नो में अंकित और जन-मानस की स्मृतियों में रचे-बसे करटिया भेरुजी एक अत्यंत लोकप्रिय और शक्तिशाली लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। सदियों से भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर उनके दर पर आते रहे हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह विश्वास गहरा होता गया है कि वे अपने शरण में आने वाले हर भक्त की रक्षा करते हैं।
सांस्कृतिक परंपरा और भव्य रथ यात्रा
इस पावन क्षेत्र की सबसे अनूठी परंपरा यहाँ आयोजित होने वाली वार्षिक रथ यात्रा है। यह आध्यात्मिक यात्रा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि दो शक्ति केंद्रों के मिलन का उत्सव है। प्रतिवर्ष यह रथ यात्रा करटिया भेरुजी के स्थान से आरंभ होकर माँ आशापुरा करटीया कल्याण धाम – छत्रसालपुर तक पहुँचती है। यह यात्रा क्षेत्र की एकता, अखंडता और अटूट भक्ति का सजीव प्रमाण है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित होकर धर्म का जयघोष करते हैं।
टूटियाबेड़ फाउंडेशन: विरासत का संरक्षण
इस महान ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को संजोने और आधुनिक समय में इसे भव्यता प्रदान करने में टूटियाबेड़ फाउंडेशन की भूमिका सराहनीय रही है। आयोजक के रूप में यह फाउंडेशन न केवल रथ यात्रा का सफल प्रबंधन करता है, बल्कि करटिया भेरुजी की महिमा और लोक संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए एक सेतु का कार्य कर रहा है। आज यह स्थान न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि कल्याण और सेवा का भी धाम बन चुका है।
श्रद्धेय श्रीमती लक्ष्मी कँवर
(1927–2014)
श्रीमती लक्ष्मी कँवर (1927–2014) का चित्र है, जिन्होंने अपने पति श्री सवाई सिंह जी के देहावसान के बाद कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत किया। वे अपने भाई श्री भैरव सिंह जी के यहाँ रहीं और 2014 में उनका स्वर्गवास हुआ। आपने उन्हें “श्री टुटियाबेड़ का इतिहास” की वर्णनकर्त्री एवं लेखिका के रूप में भी उल्लेखित किया था।
श्री करण सिंहजी, और 02 मई 2018 से टूटियाबेड़ फाउंडेशन के वर्तमान महत श्री करण सिंहजी ; 1972 को जन्म, राजस्थान के ठाकुर श्री दौलत सिंहजी की बेटी राज कुमारी से शादी हुई, और उनके दो बेटा हैं।
श्री विजय सिंह
श्री लाल सिंह
श्री दीप सिंह
श्री भीम सिंह, श्री रूप सिंह
श्री भीम सिंह
श्री लक्षन सिंह ( भीमपुर )
श्री रूप सिंह
श्री भारत सिंह, श्री मानसिंह
श्री भारत सिंह
श्रीहम्मीर सिंह (विजयनगर )
श्री मानसिंह ( टूटियाबेड़ जागीर)
लक्ष्मी कुमार,शंकर सिंह , श्री भैरव सिंह
श्री शंकर सिंह (नाथीकुमार) ( जयपुर )
श्री रतन सिंह (कमलाकुमार) (बांसवाड़ा हवेली )
श्रीशिव सिंह , श्री लाल सिंह , करण सिंह ,
श्री भैरव सिंह, लक्ष्मी कुमार (सवाई सिंह) (गलाबकुमार) ( टूटियाबेड़ जागीर ) (1922-1986)
श्री सरदार सिंह(मेहताबकुमार) (टूटियाबेड़ जागीर )
श्री करण सिंह , श्री गजेंद्र सिंह
श्री करण सिंह (टूटियाबेड़ जागीर )
श्री गजेंद्र सिंह(बांसवाड़ा )
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