टूटियाबेड़ का इतिहास

 

 

 

परिचय

राजस्थान के वागड़ अंचल में स्थित बांसवाड़ा जिले की टूटियाबेड़ जागीर प्राचीन काल से ही धार्मिक आस्था, वीरता, त्याग और बलिदान की गौरवशाली परंपराओं की धरोहर रही है। यह भूमि केवल एक ऐतिहासिक जागीर भर नहीं, बल्कि लोकविश्वास, सांस्कृतिक विरासत तथा राजपूत और भील समाज के अद्वितीय सामंजस्य का सजीव प्रतीक है। यहाँ के पर्वत, वन, प्राचीन देवस्थल, स्मारक एवं लोकपरंपराएँ आज भी इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की साक्षी हैं।

ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, 12वीं शताब्दी में मारवाड़ के राठौड़ राजपूतों ने इस क्षेत्र में अपना अधिकार स्थापित किया। उन्होंने अपने वंश की एक शाखा को टूटियाबेड़ में बसाया, जबकि मुख्य शाखा गुजरात के ईडर राज्य की ओर अग्रसर हुई। कालांतर में ईडर पर राठौड़ों का सुदृढ़ शासन स्थापित हुआ और ईडर राठौड़ वंश का उदय हुआ। टूटियाबेड़ जागीर उसी ऐतिहासिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में विकसित हुई।

गो-रक्षा का महान युद्ध

स्थानीय परंपराओं के अनुसार, एक समय जाबर कोट के निकट एक ग्वाला अपनी गौओं को चराने में व्यस्त था। उसी समय बाहरी आक्रमणकारियों ने उस पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी तथा बड़ी संख्या में गौधन को लूटते हुए टूटियाबेड़ की ओर बढ़ गए। इस अमानवीय आक्रमण के दौरान अनेक गौमाताओं का वध किया गया।

जहाँ गौमाताओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, वह स्थान आज गावड़ी माता के नाम से श्रद्धापूर्वक पूजित है। नयागाँव और छत्रशालपुर की सीमा पर स्थित यह स्थल आज भी गो-भक्ति, धर्मरक्षा और लोकआस्था का पावन प्रतीक माना जाता है।

उसी समय कृष्णपाल सिंह अपने ससुराल पक्ष के यहाँ, उज्जैन की पावन शिप्रा नदी के तटवर्ती क्षेत्र से आए हुए थे। घटना का समाचार मिलते ही उन्होंने धर्म और गौ-रक्षा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते हुए संघर्ष में सम्मिलित होने का निश्चय किया।

स्थिति की गंभीरता को समझते हुए ईडर की राठौड़ राजकुमारी ने तत्काल राजपूत वीरों, कृष्णपाल सिंह तथा स्थानीय भील सरदार वेजा और वितला को संगठित कर एक सशक्त सेना का गठन किया। शत्रु के आगमन की सूचना देने के लिए रणभेरी बजाई गई और समस्त क्षेत्र युद्ध की तैयारी में जुट गया।

किन्तु शत्रु की विशाल सेना को देखकर कुछ सहयोगी दल भयभीत होकर युद्धभूमि से पीछे हट गए। इस पर राजकुमारी ने दृढ़ स्वर में घोषणा की कि जो योद्धा रणभूमि का परित्याग करेंगे, उन्हें पुनः इस भूमि पर बसने का अधिकार नहीं होगा। यह घोषणा केवल एक आदेश नहीं, बल्कि राजपूत मर्यादा, स्वाभिमान और धर्मरक्षा की अमर प्रतिज्ञा थी।

युद्ध आरम्भ हुआ और राजकुमारी ने अद्वितीय साहस एवं पराक्रम का परिचय दिया। भीषण संघर्ष के दौरान उनका एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया, किन्तु उन्होंने युद्धभूमि नहीं छोड़ी। वे अंतिम क्षण तक शत्रुओं का सामना करती रहीं। अंततः शत्रुओं ने उन्हें लोहे की जंजीरों से एक वृक्ष से बाँधकर जीवित अग्नि में जला दिया। इस प्रकार उन्होंने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।

आज उनका बलिदान-स्थल सागोली माता के रूप में वडली पाड़ा में पूजनीय है। उन्हें शक्ति, साहस एवं त्याग की देवी के रूप में स्मरण करते हैं।

लाखा घाटी का युद्ध

गो-रक्षा के इस संघर्ष का प्रथम बड़ा युद्ध लाखा घाटी में हुआ। रणभेरी बजाकर शत्रु के आगमन का संदेश देने वाला वीर ढोलिया सबसे पहले वीरगति को प्राप्त हुआ। इसी युद्ध में सूर्य सिंह ने भी मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। ठाकुर के विश्वस्त सहयोगी वेजा भील ने पर्वतीय मार्गों पर युद्ध करते हुए अद्वितीय साहस का परिचय दिया और वीरगति प्राप्त की।

दूसरी ओर वितला अपने वीर साथियों सहित ऊँची पहाड़ियों की ओर बढ़े, जबकि वीर कृष्ण सिंह ने जाबर कोट से दूसरी सेना का नेतृत्व करते हुए लूटी गई गौओं को मुक्त कराने का अभियान प्रारम्भ किया। दोनों दलों ने शत्रु को दो दिशाओं से घेर लिया, जिससे आक्रमणकारियों में भगदड़ मच गई।

युद्ध अत्यंत भीषण और रक्तरंजित था। राजपूत एवं भील वीरों ने कंधे से कंधा मिलाकर अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। इसी दौरान शत्रुओं ने कृष्ण सिंह को चारों ओर से घेर लिया और पीछे से आक्रमण कर उनका मस्तक धड़ से अलग कर दिया।

स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, मस्तक विच्छिन्न हो जाने के पश्चात भी उनका धड़ युद्ध करता रहा और अनेक शत्रुओं का संहार करता हुआ आगे बढ़ता रहा। अंततः उनका अश्व उन्हें महादेव गौतमेश्वर के पावन धाम तक ले आया, जहाँ उनका शरीर धरती पर गिर पड़ा। बाद में उस स्थान पर चमेली का पौधा उग आया और वह स्थान कटालिया, जो आज कडालिया के नाम से प्रसिद्ध है, एक पवित्र स्मृति-स्थल बन गया।

विजय सिंह प्रथम का दिव्य स्वप्न

स्थानीय परंपराओं के अनुसार, विजय सिंह प्रथम संतानहीन थे। एक रात्रि उन्हें दिव्य स्वप्न में भगवान भैरव का साक्षात्कार हुआ। भैरव जी ने उन्हें आदेश दिया—

“यदि तुम रात्रि के चारों प्रहरों के भीतर मेरा मंदिर पूर्ण करोगे, तो मैं तुम्हारे वंश को समृद्धि का आशीर्वाद दूँगा तथा तुम्हारा खोया हुआ राज्य पुनः स्थापित करूँगा।”

बाद में विजय सिंह ने अपने राजमहल के समीप भैरव जी का भव्य मंदिर बनवाया। यद्यपि मंदिर निर्धारित समय में पूर्ण नहीं हो सका भैरव जी की कृपा से ही ईडर के राठौड़ विजयनगर राज्य ने पुनः अपना वैभव, प्रतिष्ठा और समृद्धि प्राप्त की।

1857 का स्वतंत्रता संग्राम एवं टूटियाबेड़ जागीर

 

 

 

11 दिसंबर 1858 को क्रांतिकारी सेना ने बांसवाड़ा पहुँचकर नगर पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उस समय बांसवाड़ा के महारावल को परिस्थितियोंवश अपना राज्य छोड़कर उत्तर दिशा के घने वनों में शरण लेने के लिए विवश होना पड़ा। उसी कालखंड में टूटियाबेड़ जागीर का विशेष सामरिक एवं ऐतिहासिक महत्व था। इस जागीर के प्रमुख शासक महाराज श्री दीपसिंह राठौड़ अपने क्षेत्र के पुनर्निर्माण, सुरक्षा एवं विकास के लिए निरंतर प्रयासरत थे। इसी उद्देश्य से साबरकांठा (उत्तर गुजरात) के विजयनगर राज्य की ओर से उनके सहयोगियों द्वारा ऊँटों के माध्यम से अनाज, धन तथा आवश्यक सामग्री टूटियाबेड़ जागीर लाई जा रही थी। किन्तु इस रसद सामग्री को तात्या टोपे लूट लिया गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में महाराज श्री दीपसिंह राठौड़ के साथी वीरगति को प्राप्त हुए तथा स्वयं महाराज गंभीर रूप से घायल हो गए। प्राप्त घावों के कारण उनका एक पैर स्थायी रूप से निष्क्रिय हो गया। इसके बावजूद उन्होंने अपने क्षेत्र की रक्षा और पुनर्स्थापना के प्रयासों को नहीं छोड़ा।

H.H. Maharaja Hamir Singh Ji II

विजयनगर (पोल स्टेट) में गोद लिया जाना

उस समय गुजरात के साबरकांठा स्थित ऐतिहासिक पोल स्टेट (वर्तमान विजयनगर राज्य) के शासक निःसंतान थे। राजपरंपरा एवं उत्तराधिकार की मर्यादा को बनाए रखने के उद्देश्य से टूटियाबेड़ जागीर के महाराज भारत सिंह जी के सुपुत्र महाराज हमीर सिंह जी को विधिवत गोद लिया गया

गोद लिए जाने के उपरांत उन्हें “हिज़ हाईनेस महाराव” (H.H. Maharaja / Maharao) की उपाधि से विभूषित किया गया तथा विजयनगर राज्य का सिंहासन प्राप्त हुआ। उनके शासनकाल में राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था सुदृढ़ हुई तथा राजवंश की गौरवशाली परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और जनकल्याणकारी कार्यों को नई दिशा प्राप्त हुई।

The Contribution of the Tutiyaber Jagir and Mansingh Rathore

महाराजा हमीर सिंह जी द्वितीय के विजयनगर राज्य के शासक बनने के उपरांत सन 1915 ई. में महाराज मानसिंह राठौड़ को टूटियाबेड़ जागीर का स्वामी बनाया गया। उनके नेतृत्व में जागीर में धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का निरंतर विस्तार हुआ। उन्होंने जागीर की गौरवशाली परंपराओं, मंदिरों तथा लोक आस्थाओं के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

कलटिया भैरवजी: 500 से अधिक वर्षों की अखंड आस्था का प्रतीक
कलटिया भैरवजी आज केवल भक्ति का केंद्र नहीं हैं; उनका इतिहास 500 से अधिक वर्ष पुराना है। ऐतिहासिक परंपराओं में दर्ज और जनमानस की यादों में गहराई से बसे कलटिया भैरवजी को एक शक्तिशाली और प्रिय लोक देवता के रूप में पूजा जाता है। सदियों से श्रद्धालु प्रार्थना और आशा लेकर उनके पवित्र दरबार में आते रहे हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह विश्वास और दृढ़ हुआ है कि वे अपने चरणों में शरण लेने वाले हर व्यक्ति की रक्षा करते हैं और उन्हें आशीर्वाद देते हैं।
सांस्कृतिक विरासत और भव्य रथ यात्रा
 
इस पवित्र क्षेत्र की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक वार्षिक रथ यात्रा है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि आस्था के दो पवित्र केंद्रों के आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक है। हर साल, यह रथ यात्रा कलटिया भैरवजी के पावन गर्भगृह से शुरू होकर माँ आशापुरा कलटिया कल्याण धाम, छत्रशालपुर तक जाती है।
यह भव्य जुलूस क्षेत्र की एकता, सद्भाव और अटूट भक्ति का एक जीवंत प्रमाण है। हजारों भक्त अत्यंत उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं, जिससे पूरा वातावरण धार्मिक भजनों और आस्था के जयकारों से गूंज उठता है।
 
श्री टूटियाबेड फाउंडेशन: एक गौरवशाली विरासत का संरक्षण
 
श्री टूटियाबेड फाउंडेशन ने इस समृद्ध ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को संजोने और बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मुख्य आयोजक के रूप में, फाउंडेशन न केवल पूरी निष्ठा के साथ वार्षिक रथ यात्रा का प्रबंधन करता है, बल्कि क्षेत्र के गौरवशाली अतीत और भविष्य की पीढ़ियों के बीच एक सेतु (पुल) का काम भी करता है।
 
अपने प्रयासों के माध्यम से, फाउंडेशन सामाजिक कल्याण, धार्मिक सद्भाव और सामुदायिक सेवा को बढ़ावा देने के साथ-साथ कलटिया भैरवजी से जुड़ी परंपराओं, इतिहास और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है। आज कलटिया भैरवजी का यह पवित्र स्थान न केवल एक श्रद्धेय तीर्थ स्थल के रूप में, बल्कि आस्था, कल्याण और मानवीय सेवा के केंद्र के रूप में पहचाना जाता है, जो पाँच शताब्दियों से अधिक समय से भक्तों को प्रेरित करने वाली विरासत को आगे बढ़ा रहा है।

 

 

श्रीमती लक्ष्मी कँवर (1927-2014)
यह तस्वीर श्रीमती लक्ष्मी कँवर (1927-2014) की है। उन्होंने अपने पति श्री सवाई सिंह जी के निधन के बाद बहुत ही चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना किया। वे अपने भाई श्री भैरव सिंह जी के साथ रहती थीं और वर्ष 2014 में उनका स्वर्गवास हो गया। उन्हें “श्री टूटियाबेड का इतिहास” की कहानीकार (वर्णनकर्ता) और लेखिका के रूप में भी जाना जाता है।

 

 

मेंरा परिचय श्री टूटियाबेड़ धाम 
श्री टूटियाबेड़ धाम क्षेत्र राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है, जो प्राचीन काल से आस्था, वीरता और बलिदान की परंपरा का प्रतीक रहा है। यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, "श्री टुटियाबेड़ धाम में सन् 2007 से पूर्व से प्रतिवर्ष धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा के रूप में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती रही है।
1857 का स्वतंत्रता संग्राम एवं लाका गाटी घटनाक्रम
टूटियाबेर जागीर एवं मानसिंह राठौड़ का योगदान
उक्त कालखंड में टूटियाबेड़ जागीर का विशेष महत्व रहा। महाराज श्री मानसिंह राठौड़, जो इस जागीर के प्रमुख शासक थे, क्षेत्र के पुनर्निर्माण एवं संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत रहे।
वीरता, बलिदान एवं करटिया बावजी की स्थापना
उनके साथ उनके परिवार, समधी एवं अन्य साथियों ने भी बलिदान दिया। इस पवित्र स्थल पर करटिया बावजी की स्थापना की गई, जो आज भी श्रद्धा एवं आस्था का प्रमुख केंद्र है।

महंत श्री करण सिंह जी: वे 2 मई 2018 से Tutiyabed Foundation के वर्तमान महंत और आध्यात्मिक प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। उनका जन्म 1972 में हुआ था।

  • पारिवारिक संबंध: उनका विवाह राजस्थान के ठाकुर श्री दौलत सिंह जी की पुत्री, राज कुमारी जी के साथ हुआ है।
  • मानसिंह (सबसे पूर्वज/मूल व्यक्ति)
  • उनके पुत्र    श्री भेरवसिंह राठौड़ (भैरव सिंह)
  • उनके पुत्र    श्री  सदारसिंह राठौड़ (सरदार सिंह)
  • उनके पुत्र    श्री करण सिंह जी राठौड़