टूटियाबेड़ का इतिहास

कलटिया भैरवजी: 500 से अधिक वर्षों की अखंड आस्था का प्रतीक
कलटिया भैरवजी आज केवल भक्ति का केंद्र नहीं हैं; उनका इतिहास 500 से अधिक वर्ष पुराना है। ऐतिहासिक परंपराओं में दर्ज और जनमानस की यादों में गहराई से बसे कलटिया भैरवजी को एक शक्तिशाली और प्रिय बांसवाड़ा के कुल भैरव के रूप में पूजा जाता है। सदियों से श्रद्धालु प्रार्थना और आशा लेकर उनके पवित्र दरबार में आते रहे हैं, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह विश्वास और दृढ़ हुआ है कि वे अपने चरणों में शरण लेने वाले हर व्यक्ति की रक्षा करते हैं और उन्हें आशीर्वाद देते हैं।
सांस्कृतिक विरासत और भव्य रथ यात्रा
 
इस पवित्र क्षेत्र की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक वार्षिक रथ यात्रा है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि आस्था के दो पवित्र केंद्रों के आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक है। हर साल, यह रथ यात्रा कलटिया भैरवजी के पावन गर्भगृह से शुरू होकर माँ आशापुरा कलटिया कल्याण धाम, छत्रशालपुर तक जाती है।
यह भव्य जुलूस क्षेत्र की एकता, सद्भाव और अटूट भक्ति का एक जीवंत प्रमाण है। हजारों भक्त अत्यंत उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं, जिससे पूरा वातावरण धार्मिक भजनों और आस्था के जयकारों से गूंज उठता है।
 
श्री टूटियाबेड फाउंडेशन: एक गौरवशाली विरासत का संरक्षण
 
श्री टूटियाबेड फाउंडेशन ने इस समृद्ध ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को संजोने और बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मुख्य आयोजक के रूप में, फाउंडेशन न केवल पूरी निष्ठा के साथ वार्षिक रथ यात्रा का प्रबंधन करता है, बल्कि क्षेत्र के गौरवशाली अतीत और भविष्य की पीढ़ियों के बीच एक सेतु (पुल) का काम भी करता है।
 
अपने प्रयासों के माध्यम से, फाउंडेशन सामाजिक कल्याण, धार्मिक सद्भाव और सामुदायिक सेवा को बढ़ावा देने के साथ-साथ कलटिया भैरवजी से जुड़ी परंपराओं, इतिहास और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है। आज कलटिया भैरवजी का यह पवित्र स्थान न केवल एक श्रद्धेय तीर्थ स्थल के रूप में, बल्कि आस्था, कल्याण और मानवीय सेवा के केंद्र के रूप में पहचाना जाता है, जो पाँच शताब्दियों से अधिक समय से भक्तों को प्रेरित करने वाली विरासत को आगे बढ़ा रहा है।

 

 

 

 

परिचय

टूटियाबेर (ऐतिहासिक रूप से टूटियाबेर या टूटियाबेर और संक्षेप में टूटियाबेर जागीर के नाम से जानी जाती थी) उत्तरी बांसवाड़ा राज्य, घने जंगलों वाले वागड़ क्षेत्र में स्थित एक प्रमुख इकाई थी। बांसवाड़ा राज्य की पर्वतीय सीमाओं के बिच स्थित टूटियाबेर जागीर का इतिहास राठौर राजपूत वंश की एक दिलचस्प कहानी है, जिसमें के पौराणिक विजयनगर भीमसोर और जोधपुर इदार साम्राज्य से गहरे संबंध, भील आदिवासी आबादी के साथ जटिल रिश्ते और मराठा एवं ब्रिटिश हस्तक्षेप दोनों के विरुद्ध अपनी वित्तीय और संरचनात्मक स्वायत्तता को दृढ़तापूर्वक बनाए रखने का वर्णन है।

टूटियाबेर जागीर : महाराज मानसिंह

उत्पत्ति और टूटियाबेर से वंश

टूटियाबेर का शासक परिवार राजपूतों के कुलीन राठौर वंश से संबंधित था। इस राज्य की उत्पत्ति सीधे तौर पर पास के मूल राज्य इदर विजयसिंह के प्रारंभिक विस्तारवादी इतिहास

स्थापना (1500): इस रियासत की स्थापना 1500 में राजपूत वंशजों द्वारा की गई थी, जो प्राचीन टूटियाबेर जागीर के पास घनी, प्राकृतिक रूप से किलेबंद घाटियों में आकर बस गए थे। प्रारंभिक एक रणनीतिक पहाड़ी दर्रे में स्थित था जिसे “टूटीयाबेर” नाम से जाना जाता था, जो टूटीयाबेर जागीर के पहाड़ी को राजपूताना के बांसवाड़ा राज्य से जोड़ता था।

  • यह एक राठौर राजूपतों शादी की घटना को दर्शाता हे जिसमे पुराणिक काल में एक महाराजा शादी करने अपने ससुराल आता हे और उसकी रास्ते में धार के लुटेरों से मृत्यु हो जाती और घर नहीं जापता हे वह दर्शाया गया हे वह आगे जाकर एक टूटीया रस्म में बदल जाती हे
  •  भारत 15 अगस्त 1947 स्वतंत्रता संग्राम के टूटियाबेर

 

सरकार ने छत्रशालपुर नाम से  राजस्व गांव दर्ज कर लिया
और टूटियाबेर की जागीर की भूमि की सरकार अपने अधीन कर लिया

करण सिंह राठौड़ जी ने माँ भगावती (आशापुरा जी ) मन्दिर महादेव पहाड़ी पर स्थित था जिसे २०१८ में पुनः प्राण प्रथिता करा कर के टूटीयाबेड धाम नाम से पुनः स्थापित किया और  २०२६ में इसे टूटियाबेड फाउंडेशन के नाम से स्थापना 

1.लाखा घाटी का युद्ध

प्रथम युद्ध लाखा घाटी में 500 से 700 वर्ष पूर्व हुआ। रणभेरी बजाकर शत्रु के आगमन का संदेश देने वाला वीर ढोलिया सबसे पहले वीरगति को प्राप्त हुआ। इसी युद्ध में टूटियाबेड़ जागीर ठाकुर ने भी मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। के विश्वस्त सहयोगी वेजा भील ने पर्वतीय मार्गों पर युद्ध करते हुए अद्वितीय साहस का परिचय दिया और वीरगति प्राप्त कीटूटियाबेड़ की पहाड़ी कलटिया भैरवजी स्थित हे

2.गो-रक्षा का महान युद्ध

स्थानीय परंपराओं के अनुसार, संवत 1735 जाबर कोट के निकट एक ग्वाला अपनी गौओं को चराने में व्यस्त था। उसी समय बाहरी आक्रमणकारियों ने उस पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी तथा बड़ी संख्या में गौधन को लूटते हुए टूटियाबेड़ की ओर बढ़ गए। इस अमानवीय आक्रमण के दौरान अनेक गौमाताओं का वध किया गया।

जहाँ गौमाताओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, वह स्थान आज गावड़ी माता के नाम से श्रद्धापूर्वक पूजित है। नयागाँव और छत्रशालपुर की सीमा पर स्थित यह स्थल आज भी गो-भक्ति, धर्मरक्षा और लोकआस्था का पावन प्रतीक माना जाता है।

3.राजकुमारी

स्थिति की गंभीरता को समझते हुए राठौड़ की राजकुमारी ने तत्काल राजपूत वीरों, तथा स्थानीय भील सरदार को संगठित कर एक सशक्त सेना का गठन किया। शत्रु के आगमन की सूचना देने के लिए रणभेरी बजाई गई और समस्त युद्ध की तैयारी में जुट गया।

किन्तु शत्रु की विशाल सेना को देखकर कुछ सहयोगी दल भयभीत होकर युद्धभूमि से पीछे हट गए। इस पर राजकुमारी ने दृढ़ स्वर में घोषणा की कि जो योद्धा रणभूमि का परित्याग करेंगे, उन्हें पुनः इस भूमि पर बसने का अधिकार नहीं होगा। यह घोषणा केवल एक आदेश नहीं, बल्कि मर्यादा, स्वाभिमान और धर्मरक्षा की अमर प्रतिज्ञा थी।

युद्ध आरम्भ हुआ और राजकुमारी ने अद्वितीय साहस एवं पराक्रम का परिचय दिया। भीषण संघर्ष के दौरान उनका एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया, किन्तु उन्होंने युद्धभूमि नहीं छोड़ी। वे अंतिम क्षण तक शत्रुओं का सामना करती रहीं। अंततः शत्रुओं ने उन्हें लोहे की जंजीरों से एक वृक्ष से बाँधकर जीवित अग्नि में जला दिया। इस प्रकार उन्होंने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।

आज उनका बलिदान-स्थल सागोली माता के रूप में वडली पाड़ा में पूजनीय है। उन्हें शक्ति, साहस एवं त्याग की देवी के रूप में स्मरण करते हैं।

ऊंटों पर धन

11 दिसंबर 1858 को विद्रोहियों ने बांसवाड़े पहुँच वहां अधिकार कर लिया। उस समय महारावल ने अपने राज्य के उत्तर की तरफ जंगल में जाकर आश्रय लिया। तांतिया टोपी वहां एक दिन ठहरा और उसके आदमियों ने कपड़ों से लदे हुए सोलह-सत्रह ऊंटों को, जो अहमदाबाद से आ रहे थे, लूट लिया।

सहित  गांव की सिमा के चारो और  बढ़े, जबकि वीर केसर सिंह ने बांसवाड़ा राज की और  से दूसरी सेना का नेतृत्व करते हुए लूटी गई ऊंटों को मुक्त कराने का अभियान प्रारम्भ किया। दोनों दलों ने शत्रु को दो दिशाओं से घेर लिया, जिससे आक्रमणकारियों में भगदड़ मच गई।

युद्ध अत्यंत भीषण और रक्तरंजित था। राजपूत एवं  ने कंधे से कंधा मिलाकर अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। इसी दौरान शत्रुओं ने केसर सिंह को चारों ओर से घेर लिया और आक्रमण कर उनका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। आज भी छत्रशालपुर के प्रवेश द्वार के निकट शिला केख और प्रतिमा स्थित हे  

H.H. Maharaja Hamir Singh Ji II

विजयनगर (पोल स्टेट) में गोद लिया जाना

उस समय गुजरात के साबरकांठा स्थित ऐतिहासिक पोल स्टेट (वर्तमान विजयनगर राज्य) के शासक निःसंतान थे। राजपरंपरा एवं उत्तराधिकार की मर्यादा को बनाए रखने के उद्देश्य से टूटियाबेड़ जागीर के महाराज हमीर सिंह जी को विधिवत गोद लिया गया।

गोद लिए जाने के उपरांत उन्हें “हिज़ हाईनेस महाराव” (H.H. Maharaja / Maharao) की उपाधि से विभूषित किया गया तथा विजयनगर राज्य का सिंहासन प्राप्त हुआ। उनके शासनकाल में राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था सुदृढ़ हुई तथा राजवंश की गौरवशाली परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और जनकल्याणकारी कार्यों को नई दिशा प्राप्त हुई।

The Contribution of the Tutiyaber Jagir and Mansingh Rathore

 

 सूरज कुंवर से शादी करा के महाराज मानसिंह राठौड़ को टूटियाबेड़ जागीर का स्वामी बनाया गया। उनके नेतृत्व में जागीर में धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का निरंतर विस्तार हुआ। उन्होंने जागीर की गौरवशाली परंपराओं, मंदिरों तथा  आस्थाओं के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

 

श्रीमती लक्ष्मी कँवर (1927-2014)
यह तस्वीर श्रीमती लक्ष्मी कँवर (1927-2014) की है। उन्होंने अपने पति श्री सवाई सिंह जी के निधन के बाद बहुत ही चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना किया। वे अपने भाई श्री भैरव सिंह जी के साथ रहती थीं और वर्ष 2014 में उनका स्वर्गवास हो गया। उन्हें “श्री टूटियाबेड का इतिहास” की कहानीकार (वर्णनकर्ता) और लेखिका के रूप में भी जाना जाता है।

 

 

मेंरा परिचय श्री टूटियाबेड़ धाम 
श्री टूटियाबेड़ धाम क्षेत्र राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है, जो प्राचीन काल से आस्था, वीरता और बलिदान की परंपरा का प्रतीक रहा है। यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, "श्री टुटियाबेड़ धाम में सन् 2007 से पूर्व से प्रतिवर्ष धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा के रूप में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती रही है।
1857 का स्वतंत्रता संग्राम एवं लाका गाटी घटनाक्रम
टूटियाबेर जागीर एवं मानसिंह राठौड़ का योगदान
उक्त कालखंड में टूटियाबेड़ जागीर का विशेष महत्व रहा। महाराज श्री मानसिंह राठौड़, जो इस जागीर के प्रमुख शासक थे, क्षेत्र के पुनर्निर्माण एवं संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत रहे।
वीरता, बलिदान एवं करटिया बावजी की स्थापना
उनके साथ उनके परिवार, समधी एवं अन्य साथियों ने भी बलिदान दिया। इस पवित्र स्थल पर करटिया बावजी की स्थापना की गई, जो आज भी श्रद्धा एवं आस्था का प्रमुख केंद्र है।

महंत श्री करण सिंह जी: वे 2 मई 2018 से Tutiyabed Foundation के वर्तमान महंत और आध्यात्मिक प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। उनका जन्म 1972 में हुआ था।

पारिवारिक संबंध: उनका विवाह राजस्थान के ठाकुर श्री दौलत सिंह जी की पुत्री, राज कुमारी जी के साथ हुआ है। 

    • रतन सिंह : महाराजा रतन सिंह मारवाड़ से इधर गया इधर दे यहाँ आया
    • ठाकुर लक्ष्मण सिंह  : भीमसोर  ठिकाने 
    • H.H महाराज हमीर सिंह जी : विजयनगर राज 
    •  मानसिंह राठौड़ : टूटियाबेड़ जागीर
    • विजय सिंह जी  विजयनगर (पोल स्टेट) 
    •  1.मन सिंह जी 2.ताकत सिंह जी 3.भारत सिंह जी 4.अभय सिंह जी 1727 
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    • मानसिंह ने टूटियाबेर की  सूरज कुंवर से शादी की
    • उनके पुत्र    श्री भेरवसिंह राठौड़ (भैरव सिंह)
    • उनके पुत्र    श्री  सदारसिंह राठौड़ (सरदार सिंह)
    • उनके पुत्र    श्री करण सिंह जी राठौड़
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